Blog

पितृपक्ष केवल परंपरा नहीं, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का संस्कार है — श्याम कुमार गुप्ता

संस्कारों से जुड़ा परिवार ही पीढ़ियों को जोड़ता है, पितृपक्ष हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का अवसर देता है — श्याम कुमार गुप्ता

रायगढ़। सनातन धर्म में मानव जीवन से जुड़े धार्मिक पर्व, पूजा-पद्धतियों और संस्कारों की अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक गहराई है। जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति को परिवार, समाज, प्रकृति और अपने पूर्वजों के प्रति जिम्मेदारी तथा कृतज्ञता का भाव सिखाया जाता है। वर्तमान में चल रहे पितृपक्ष को इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए प्रेस रिपोर्टर क्लब के प्रदेश सचिव एवं नागरिक सुरक्षा सेवा संगठन के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष श्याम कुमार गुप्ता ने कहा कि पूर्वजों को याद करना केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और पारिवारिक विरासत के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है।

श्याम कुमार गुप्ता ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने जिन धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं को सम्मान के साथ अपनाया और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया, उनके पीछे केवल परंपरा नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाले अनेक भाव निहित हैं। आज बदलते सामाजिक परिवेश में परिवारों में बढ़ते मतभेद, रिश्तों में दूरी और पारिवारिक संबंधों में टूटन दिखाई देती है। ऐसे समय में पारिवारिक संस्कारों और परंपराओं के महत्व को समझना और भी आवश्यक हो जाता है।

उन्होंने कहा कि पितृपक्ष के दौरान कई दिनों तक लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी तथा पूर्वजों को स्मरण करते हैं, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उनके योगदान को याद करते हैं। उनके अनुसार, यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि जिस परिवार और समाज की नींव जिन लोगों ने रखी, उन्हें भुलाया नहीं जाना चाहिए।

उन्होंने उन लोगों की आलोचनाओं का भी उल्लेख किया जो पितृपक्ष जैसे संस्कारों पर सवाल उठाते हैं। श्याम कुमार गुप्ता ने कहा कि किसी व्यक्ति का इन परंपराओं को मानना या न मानना उसका व्यक्तिगत विषय हो सकता है, लेकिन सदियों से चली आ रही किसी सामाजिक परंपरा का मजाक उड़ाने के बजाय उसकी भावनात्मक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति अपने पूर्वजों, परिवार और संस्कारों के महत्व को समझता है, वही इन परंपराओं की वास्तविक गहराई को महसूस कर सकता है। पितृपक्ष हमें अपने पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का अवसर देता है।”

श्याम कुमार गुप्ता ने कहा कि आधुनिक शिक्षा और विकास के साथ संस्कारों का महत्व भी बना रहना चाहिए। उनके अनुसार, संस्कार मनुष्य को केवल ज्ञानवान नहीं, बल्कि अपने परिवार, समाज और संबंधों के प्रति जिम्मेदार बनाने का माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक और मृत्यु के बाद भी पूर्वजों के स्मरण की परंपरा का होना इस संस्कृति की निरंतरता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा, “मुझे गर्व है कि मैं सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का एक छोटा-सा हिस्सा हूं। हमारे पूर्वजों ने जिन संस्कारों को जीवित रखा, उन्हें सम्मान के साथ अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी भी जिम्मेदारी है।”

अंत में उन्होंने अपने पूर्वजों और उन सभी पुरखों को श्रद्धापूर्वक नमन किया, जिन्होंने परिवार, समाज और संस्कृति की नींव को मजबूत बनाने में अपना योगदान दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
ताज़ा ख़बरें
शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए प्राचार्य अमृतलाल सिदार को मिला छत्तीसगढ़ गौरव सम्मान कोयला खनन में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली 50 खदानों को स्टार रेटिंग पुरस्कारों से किया गया सम्मानित किसानों के खाते में 1.5 लाख करोड़ जाने पर कांग्रेस दर्द में:अमित चिमनानी धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2026 पर जागरूकता कार्यक्रम का भव्य एवं ऐतिहासिक आयोजन हर गांव में मजबूत होगा बाल सुरक्षा तंत्र, ग्राम स्तरीय सतर्कता व्यवस्था विकसित करने की पहल: डॉ. वर्ण... पिथौरा में भव्य छत्तीसगढ़ प्रांतीय कलार महोत्सव व महिला सम्मान समारोह संपन्न,मुख्य अतिथि रूप में बसन... ओडिशा के सुंदरगढ़ के निशानेबाजों ने शूटिंग प्रतियोगिता में जीते पदक जागरूक नागरिक की मन की बात माँ चंद्रहासिनी देवी धाम में रावण दहन के दौरान आयोजित डांस प्रतियोगिता के विजेता सांवरिया भटगांव का ... छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग का गौरव हैं अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक सुरेशा चौबे जी, नारी शक्ति की मिसाल को ...