रायगढ़ की जनसुनवाई बनी ‘रंग सुनवाई’? किरदार तय, पीड़ितों की आवाज़ कहां जाए?



रंगमंच की तरह दिखती है पूरी प्रक्रिया—प्रेस रिपोर्टर क्लब ने जनहित में उठाए गंभीर सवाल


रायगढ़। जिले में उद्योग और खनन परियोजनाओं को लेकर होने वाली जनसुनवाइयों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। प्रभावित लोगों के बीच ‘जनसुनवाई’ को ‘रंग सुनवाई’ कहे जाने का व्यंग्य इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं यह प्रक्रिया केवल दिखावे और औपचारिकता तक तो सीमित नहीं हो गई है।
‘रंग सुनवाई’ का आशय किसी औपचारिक प्रक्रिया को नकारना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल उठाना है, जिसमें जनता को ऐसा महसूस हो कि जनसुनवाई किसी रंगमंच की तरह हो गई है—किरदार तय हैं, पात्र तय हैं, भूमिकाएं तय हैं और हर कोई अपनी-अपनी भूमिका निभाकर चला जाता है। सवाल यह है कि इस पूरे मंच पर वास्तविक पीड़ित जनता की आवाज़ की भूमिका आखिर कितनी प्रभावी है?
प्रेस रिपोर्टर क्लब ने जताई गंभीर चिंता
प्रेस रिपोर्टर क्लब ने इस पूरे विषय को जनहित से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए चिंता व्यक्त की है। क्लब का कहना है कि जनसुनवाई में पीड़ित लोगों की बात वास्तव में कितनी सुनी जा रही है, इसका सही आकलन जमीनी स्तर पर जाकर ही किया जा सकता है। प्रभावित परिवारों से बातचीत करने पर उनकी पीड़ा और असंतोष सामने आता है।
क्लब के अनुसार, कई प्रभावित लोगों को यह शिकायत रहती है कि वे अपनी समस्याएं और आपत्तियां लेकर जनसुनवाई तक पहुंचते हैं, लेकिन उनकी बात उस प्रभावशीलता से सामने नहीं आ पाती, जिसकी वे अपेक्षा करते हैं। इससे उनके भीतर यह भावना पैदा होती है कि उनकी आवाज दबकर रह गई और जिस प्रक्रिया से उन्हें न्याय की उम्मीद थी, उसमें वे स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
प्रेस रिपोर्टर क्लब का कहना है कि यदि किसी परियोजना से जुड़े पक्ष जनसुनवाई की प्रक्रिया से अपना अपेक्षित लाभ लेकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन वास्तविक प्रभावित व्यक्ति अपनी समस्याओं और भविष्य की चिंता के साथ पीछे रह जाता है, तो यह निश्चित रूप से गंभीर जनहित का सवाल है।
हालांकि किसी विशेष जनसुनवाई में मिलीभगत या पूर्व-निर्धारित भूमिका जैसे आरोपों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और स्वतंत्र जांच से ही हो सकती है, लेकिन प्रभावित जनता की शिकायतों को गंभीरता से सुनना और उनकी आपत्तियों पर पारदर्शी तरीके से विचार करना आवश्यक है।
विकास जरूरी, लेकिन जनता की कीमत पर नहीं
रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में विकास और रोजगार के अवसर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विकास के साथ स्थानीय जनता के अधिकार, पर्यावरण, जमीन, जलस्रोत, आजीविका और भविष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
आज सवाल केवल यह नहीं है कि जनसुनवाई में कितने लोगों ने समर्थन किया और कितनों ने विरोध। असली सवाल यह है कि कितने वास्तविक प्रभावित लोगों की बात दर्ज हुई, उनकी आपत्तियों पर क्या विचार हुआ और अंततः उन आपत्तियों का क्या परिणाम निकला?
प्रेस रिपोर्टर क्लब का कहना है कि पत्रकारिता का दायित्व केवल कार्यक्रम की तस्वीर और बयान प्रकाशित करना नहीं, बल्कि पीड़ित और प्रभावित व्यक्ति की आवाज को भी सामने लाना है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को व्यवस्था के बीच छल-कपट का शिकार महसूस कर रहा है, तो उसकी पीड़ा को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए।
जनसुनवाई अगर जनता की आवाज सुनने का मंच है, तो उसे रंगमंच नहीं बनना चाहिए। प्रक्रिया पारदर्शी हो, सभी पक्षों को समान अवसर मिले और प्रभावित जनता की आपत्तियों का स्पष्ट रिकॉर्ड तथा उस पर लिए गए निर्णय की जानकारी सार्वजनिक हो—तभी जनसुनवाई अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगी।
रायगढ़ की जनता का सवाल आज भी वही है—
“जनसुनवाई सच में जनता की सुनवाई है, या सिर्फ एक ऐसी ‘रंग सुनवाई’, जिसमें मंच जनता के लिए है, लेकिन पटकथा कहीं और लिखी जाती है?”