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बरौद कोल माइंस के विस्थापितों की गूंज – रायगढ़ में उठी हक की हुंकार, “अबकी बार अधिकार लेकर रहेंगे”*



घरघोड़ा। बरौद गांव के कोल माइंस के विस्थापित परिवारों का गुस्सा अब उबाल पर है। सोमवार को रायगढ़ की सड़कों पर हजारों की तादाद में विस्थापित महिलाएं, बुजुर्ग और युवा उतरे तो माहौल पूरी तरह आंदोलनकारी हो गया। हाथों में तख्तियां, सिर पर लाल-पट्टी, झंडे और बैनर… हर तरफ एक ही आवाज़ गूंज रही थी – “हमारा हक़ हमें दो, बरौद विस्थापित जगे हैं।”धरना स्थल पर डटे लोगों का जोश देखते ही बन रहा था। महिलाएं ढोलक बजाकर गीतों में अपना दर्द सुना रही थीं, बच्चे तक हाथ में पोस्टर लिए नारे लगा रहे थे। “एसईसीएल होश में आओ”, “बरौद का हक़ लौटाओ”, “भीख नहीं, अधिकार चाहिए” जैसे नारे लगातार गूंजते रहे। ऐसा लग रहा था मानो रायगढ़ का कलेक्टोरेट एक जनसैलाब में तब्दील हो गया हो।हुआ। यह नज़ारा साफ बता रहा था कि यह लड़ाई अब सिर्फ कुछ लोगों की नहीं, बल्कि पूरे गांव के अस्तित्व की है।मंच से वक्ताओं ने एक-एक कर आरोपों की झड़ी लगा दी। कहा गया कि बरौद गांव के लोगों ने अपनी ज़मीन और घर विकास के नाम पर कुर्बान किए, लेकिन बदले में आज तक उन्हें न घर मिला, न रोज़गार, न ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं। वक्ताओं ने साफ चेतावनी दी – “अब और इंतज़ार नहीं। या तो वादा पूरा करो, या फिर रायगढ़ प्रशासन हर रोज़ विस्थापितों का आक्रोश झेले।युवाओं ने भी मंच से हुंकार भरी। उन्होंने कहा कि 18 साल पूरे होने के बाद भी परिवारों को अलग मानकर लाभ नहीं दिया जा रहा। “क्या हमारी पीढ़ी का कोई अस्तित्व नहीं? क्या हमें सिर्फ मज़दूर बनाकर छोड़ देना है?” – इस सवाल ने पूरे माहौल को और भी उग्र कर दिया।धरना स्थल पर जैसे ही “हक़ दो – न्याय दो” का नारा उठा, पूरा मैदान गूंज गया। महिलाएं, पुरुष, बच्चे… सब एक स्वर में चीख रहे थे। प्रशासन के खिलाफ गुस्से का आलम ऐसा था कि पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद लोगों के तेवर ठंडे नहीं पड़े।
बरौद कोल माइंस के विस्थापितों का यह आंदोलन रायगढ़ की फिज़ा में एक संदेश छोड़ गया – अब लड़ाई अधूरे वादों और छलावे के खिलाफ है। अबकी बार विस्थापित पीछे नहीं हटेंगे।

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