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हथियार छोड़ थामी हुनर की राह: दंतेवाड़ा में आत्मसमर्पित नक्सली लिख रहे हैं आत्मनिर्भरता की नई इबारत

महिला पत्रकारों की टीम ने ‘लाइवलीहुड कॉलेज’ का भ्रमण कर देखी बदलाव की जीवंत तस्वीर
बस्तर से लौट कर बीता चक्रवर्ती की रिपोर्ट

कोरबा।कभी बंदूक की गूंज और डर के साये में जीने वाला दंतेवाड़ा आज उम्मीद और कौशल विकास की नई मिसाल पेश कर रहा है। जिला प्रशासन के ‘लोन वर्राटू’ (घर वापस आइए) अभियान और पुलिस प्रशासन के सतत संवाद का परिणाम है कि आज दंतेवाड़ा का लाइवलीहुड कॉलेज बदलाव का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। हाल ही में महिला पत्रकारों के एक विशेष दल (टोरबासिल टीम) ने इस केंद्र का दौरा किया और उन युवाओं से मुलाकात की जो कभी मुख्यधारा से भटक कर जंगलों की राह चुन चुके थे।
हुनर से संवर रहा कल
वर्तमान में लाइवलीहुड कॉलेज में 500 से अधिक आत्मसमर्पित नक्सली विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण ले रहे हैं। इनमें वे युवक-युवतियां भी शामिल हैं, जिन पर शासन द्वारा 5 लाख रुपये तक का इनाम घोषित था। कल तक जंगलों में हथियार लेकर घूमने वाले ये हाथ आज सिलाई मशीन, वेल्डिंग रॉड और इलेक्ट्रिकल किट थामकर अपने भविष्य को आकार दे रहे हैं। कई युवा प्रशिक्षण पूर्ण कर शासन की योजनाओं के तहत लोन लेकर अपना स्वयं का व्यवसाय भी शुरू कर चुके हैं।
महिला पत्रकारों ने जानी जमीनी हकीकत
इस सकारात्मक बदलाव को करीब से महसूस करने के लिए महिला पत्रकारों की एक टीम ने लाइवलीहुड कॉलेज की यात्रा की। इस टीम में मीता चक्रवर्ती (एसिन्यूज), सत्यम सरकार (डीबी न्यूज़), पेन्यूज, साधना न्यूज़, रजनी चौहान (एसीएन न्यूज), मुस्कान भंडारी (ग्रैंड न्यूज) और आशा ठाकुर (आईबीएन न्यूज) शामिल रहीं। पत्रकारों ने पाया कि प्रशिक्षणार्थियों में अपने परिवार के लिए कुछ बेहतर करने का जबरदस्त उत्साह है। विशेष रूप से बड़ी संख्या में शामिल महिलाएं और युवतियां, जो पहले नक्सल संगठन का हिस्सा थीं, अब आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही हैं।
प्रशासनिक संवाद और चुनौतियों पर विजय
दंतेवाड़ा के एसडीओपी राहुल कुमार उईके ने इस सफलता के पीछे की कहानी साझा करते हुए बताया कि 2022 से हमने सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाकर ग्रामीणों से सीधा संवाद स्थापित किया। यह काम चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि ग्रामीणों का विश्वास जीतना और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना एक लंबी प्रक्रिया थी। कड़े ऑपरेशनों के साथ-साथ ‘संवाद’ ही वह चाबी साबित हुई जिसने बदलाव के द्वार खोले।पूर्व नक्सलियों को कौशल विकास के बाद व्यवसाय हेतु ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है।कॉलेज प्रशासन के अनुसार, अब ये युवा दोबारा संगठन में नहीं लौटना चाहते और ईमानदारी की कमाई से परिवार का भरण-पोषण करना चाहते हैं। पुरुष कैडर्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर महिलाएं भी तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। दंतेवाड़ा की यह बदलती तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि यदि सही अवसर, उचित मार्गदर्शन और समाज का विश्वास मिले, तो हिंसा का रास्ता छोड़ चुके युवा भी राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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