जल–जंगल–जमीन के विनाश ने बेजुबानों को भिखारी बनाया: श्याम गुप्ता

प्रकृति से छेड़छाड़ की बड़ी कीमत चुकाएगा मानव, बंदरों की दुर्दशा चेतावनी का संकेत

जंगल उजड़े, जीव जंतु बेघर—स्वार्थी विकास मॉडल पर तीखा सवाल

छत्तीसगढ़ रायगढ़ / पर्यावरण संरक्षण को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता श्याम गुप्ता ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि “जल, जंगल और जमीन के बर्बाद होने का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बेगुनाह जीव-जंतुओं पर पड़ रहा है।” उन्होंने चिंता जताई कि आज शहरों और गांवों की सड़कों पर खाना मांगते बंदर, मानव के स्वार्थी विकास मॉडल के जीवंत प्रमाण बन चुके हैं।
गुप्ता ने कहा कि जो लोग स्वयं को ‘रामभक्त’ कहते हैं, वही बंदरों के प्राकृतिक घर—जंगल—को काट कर कंक्रीट के जंगल में बदल रहे हैं। परिणामस्वरूप, बंदर अपने भोजन, आवास और प्राकृतिक जीवन से वंचित होकर सड़क पर भीख मांगने को मजबूर हो गए हैं। उन्होंने इसे “मानव सभ्यता के लिए शर्मनाक स्थिति” बताया।
उन्होंने जोर देकर कहा कि बंदर सिर्फ एक जीव नहीं, बल्कि मानव प्रजाति के विकास क्रम का हिस्सा हैं, जिन्हें सम्मान और संरक्षण मिलना चाहिए। बंदर सड़कों पर आकर अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हजारों ऐसे जीव-जंतु हैं जो न तो सड़क पर आ सकते हैं, न ही मनुष्यों से मदद मांग सकते हैं—और यही सबसे बड़ा दुख है।






गुप्ता ने चेतावनी दी कि प्राकृतिक संसाधनों से छेड़छाड़ का परिणाम अत्यंत भीषण होगा। जंगल कटेंगे, नदियाँ सूखेंगी, जमीन बंजर होगी और आने वाली पीढ़ियाँ इस विनाश की भारी कीमत चुकाएंगी।
उन्होंने मानव समाज से अपील की कि विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन बंद करें और जल–जंगल–जमीन को बचाने का संकल्प लें। क्योंकि यदि प्रकृति नष्ट हुई, तो मानव का अस्तित्व भी लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह पाएगा मेरी हैसियत बहुत छोटी है फिर भी मेरी प्रयास होती है अपने परिवार के साथ बेजुबानो की सेवा अवसर मिलता है करता हुँ क्योंकि अब मुझे स्वार्थी मानव होने के डर है l
