बेगुनाह पर पुलिस का शिकंजा, असली दोषी अब भी बाहर

लाल टोपी राजू सोनी के कलम से
राजनांदगांव।
कृष्णा हॉस्पिटल से जुड़ा नवजात शिशु का मामला अब केवल एक दंपत्ति की गिरफ्तारी तक सिमटता नजर आ रहा है, जबकि इस पूरे प्रकरण की जड़ में मौजूद अस्पताल और डॉक्टरों की भूमिका पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। एक नाबालिग के यौन शोषण से जन्मे नवजात को फर्जी पहचान देकर अवैध रूप से दत्तक सौंपने का यह मामला जितना गंभीर है, उतनी ही चिंताजनक पुलिस जांच की दिशा भी बनती जा रही है।
कानून स्पष्ट है कि नाबालिग की डिलीवरी के मामलों में किशोर न्याय अधिनियम और पॉक्सो एक्ट के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग, बाल कल्याण समिति को सूचना और नवजात की वैधानिक सुरक्षा जरूरी है। इसके बावजूद नवजात को एक अस्पताल से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया गया, उसे “दूसरों का बच्चा” बताकर प्रस्तुत किया गया और जन्म प्रमाण पत्र जैसी संवेदनशील प्रक्रिया बिना विधिक आधार पूरी कर ली गई।
हैरानी की बात यह है कि मामूली सात–आठ हजार रुपये की मजदूरी करने वाले जरूरतमंद लोग आज पुलिस की गिरफ्त में हैं, जबकि जिन पर एमटीपी एक्ट, पॉक्सो और किशोर न्याय अधिनियम के उल्लंघन का सीधा आरोप बनता है, वे अब भी जांच की पहुंच से बाहर हैं। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या जांच का रुख कमजोर कड़ियों तक सीमित कर दिया गया है।
पुलिस का कहना है कि अस्पताल से साक्ष्य जुटाए गए हैं और आगे कार्रवाई की जाएगी, लेकिन जनता अब आश्वासन नहीं, कार्रवाई देखना चाहती है। क्योंकि जब एक नवजात की पहचान छीनी जाए, नाबालिग मां की आवाज दबा दी जाए और अस्पताल ही कानून तोड़ते नजर आएं, तो यह मामला केवल अपराध नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की परीक्षा बन जाता है।
