आपातकाल 1975: भारतीय संविधान और लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह, इंदिरा गांधी सरकार की भूमिका पर आज भी बहस जारी

संविधान के इतिहास का सबसे विवादित अध्याय: आपातकाल के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को माना जाता है मुख्य जिम्मेदार


नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल (Emergency) आज भी सबसे विवादित घटनाओं में गिना जाता है। इतिहासकारों, राजनीतिक विश्लेषकों और विभिन्न राजनीतिक दलों के अनुसार आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध, प्रेस सेंसरशिप, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी तथा संवैधानिक संस्थाओं पर व्यापक नियंत्रण देखने को मिला। इस कारण इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक भावना के लिए एक गंभीर चुनौती माना जाता है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi की सलाह पर 25 जून 1975 को संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया था। इसके बाद अनेक विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए।
आपातकाल के दौरान 38वें, 39वें और 42वें संविधान संशोधनों को लेकर भी व्यापक विवाद हुआ। आलोचकों का कहना है कि इन संशोधनों ने कार्यपालिका की शक्तियों को बढ़ाया और न्यायिक समीक्षा को सीमित करने का प्रयास किया। बाद में जनता पार्टी सरकार ने कई प्रावधानों को निरस्त या संशोधित किया।
हालांकि यह भी तथ्य है कि आपातकाल संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत घोषित किया गया था और उस समय संसद से अनुमोदित हुआ था। इसलिए इसे “संविधान का अपमान” कहना एक राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण हो सकता है, जबकि ऐतिहासिक रूप से यह कहना अधिक सटीक होगा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों के सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक था, जिसकी जिम्मेदारी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी सरकार पर प्रमुख रूप से डाली जाती है।

