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प्रश्नों के घेरे में ‘पत्रकारिता’ : कौन तय करता है असली पत्रकार?

पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर अख़बार इस स्तंभ की मर्यादा निभा रहा है? हाल ही में जनवंधु जैसे स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित एक सामग्री में जिस तरह से व्यक्तिगत टिप्पणियों और लेबलिंग के ज़रिये एक महिला पत्रकार की छवि पर सवाल खड़े किए गए, उसने मीडिया की भूमिका पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है।

किसी व्यक्ति को “फर्जी पत्रकार” कह देना क्या आज की पत्रकारिता का नया ट्रेंड बन चुका है? और उससे भी बड़ा सवाल — क्या किसी अख़बार को यह अधिकार है कि वह तय करे कि कौन असली पत्रकार है और कौन नहीं?

जानकारी के अनुसार, जिस महिला पत्रकार पर सवाल उठाए गए, उनके पास पत्रकारिता से संबंधित विधिवत डिग्री है और वे लंबे समय से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इसके बावजूद, बिना किसी आधिकारिक पुष्टि, बिना पक्ष जाने, एकतरफा ढंग से उनकी पहचान पर सवाल उठाना न सिर्फ़ असंवेदनशील है, बल्कि पत्रकारिता की आचार संहिता के भी खिलाफ़ है।

यह कोई पहली बार नहीं है जब जनवंधु सहित कुछ तथाकथित मीडिया संस्थान व्यक्तिगत रंजिश या बदले की भावना से खबरों को हथियार बना रहे हों। जब खबर तथ्यों पर नहीं, बल्कि निजी दुर्भावना पर आधारित हो, तब वह पत्रकारिता नहीं, बल्कि चरित्र हनन की श्रेणी में आती है।

यह भी एक कड़वा सच है कि आज कई ऐसे लोग पत्रकार बने घूम रहे हैं, जिनके पास न तो कोई मान्यता है, न प्रशिक्षण और न ही जिम्मेदारी का बोध। लेकिन विडंबना देखिए — सवाल उनसे नहीं पूछे जाते, बल्कि उन लोगों पर उंगली उठाई जाती है जो पढ़े-लिखे हैं, प्रशिक्षित हैं और सिस्टम से सवाल करने का साहस रखते हैं।

जनवंधु जैसे अख़बारों का काम सवाल उठाना है, लेकिन सवाल सत्ता से, सिस्टम से और व्यवस्था से होने चाहिए — किसी व्यक्ति की इज़्ज़त, पहचान और आत्मसम्मान से नहीं। अगर मीडिया ही जज बन बैठेगा, तो फिर न्याय कौन करेगा?

यह लेख किसी एक व्यक्ति के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ़ है जो अख़बार को हथियार और खबर को बदले का ज़रिया बना रही है। पत्रकारिता में आलोचना होनी चाहिए, लेकिन तथ्यों के साथ। असहमति होनी चाहिए, लेकिन शालीनता के साथ।

आज ज़रूरत इस बात की है कि मीडिया आत्ममंथन करे। क्योंकि अगर पत्रकार ही पत्रकारों को अपमानित करेंगे, तो आम जनता किस पर भरोसा करेगी?

यह सवाल सिर्फ़ एक महिला पत्रकार का नहीं है, यह सवाल पूरी पत्रकारिता की साख का है।

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