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21 से 27 दिसम्बर: भारत के इतिहास का शोक सप्ताह, जब गुरु गोविंद सिंह जी का पूरा परिवार धर्म और राष्ट्र के लिए शहीद हुआ

छह और आठ साल के साहिबजादों की अमर शहादत—जिसने भारत की आत्मा को झुका नहीं, बल्कि और ऊँचा उठा दिया

21 दिसम्बर से 27 दिसम्बर तक का सप्ताह भारत के इतिहास में केवल तारीखें नहीं, बल्कि शौर्य, त्याग और बलिदान की अमर गाथा है। यह वही सप्ताह है जब सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोविंद सिंह जी का पूरा परिवार धर्म, कौम और राष्ट्र की रक्षा के लिए शहीद हो गया। इसीलिए यह सप्ताह ‘शोक सप्ताह’ के साथ-साथ ‘शौर्य सप्ताह’ भी कहलाता है।

पूस माह के 13वें दिन, सरहिन्द के नवाब वजीर खान ने गुरु गोविंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों—छह वर्षीय फतेह सिंह और आठ वर्षीय जोरावर सिंह से इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया। मासूम उम्र, लेकिन अदम्य साहस। साहिबजादे फतेह सिंह ने नवाब से प्रश्न किया—“अगर मुसलमान हो गए तो क्या फिर कभी मरना नहीं पड़ेगा?” जब नवाब निरुत्तर रह गया, तो साहिबजादे ने कहा—“जब मरना ही है, तो अपने धर्म के लिए क्यों न मरा जाए।”

इसके बाद दोनों साहिबजादों को ज़िंदा दीवार में चिनवाने का क्रूर आदेश दिया गया। जब दीवार फतेह सिंह की गर्दन तक पहुँची, तब बड़े भाई जोरावर सिंह रो पड़े। पूछने पर उन्होंने कहा—“रो इसलिए रहा हूँ कि मैं पहले आया था, लेकिन कौम के लिए शहीद तू पहले हो रहा है।”

25 दिसम्बर की ठंडी रात माता गुजरी ने दोनों बच्चों के साथ सरहिन्द किले की ठंडी बुर्ज में बिताई। 26 दिसम्बर को दोनों साहिबजादे शहीद हो गए और 27 दिसम्बर को माता गुजरी ने भी प्राण त्याग दिए। इससे पहले, बड़े साहिबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह भी युद्धभूमि में शहीद हो चुके थे।

कभी पंजाब में इस सप्ताह लोग ज़मीन पर सोते थे, शहादत को नमन करने के लिए। आज अंग्रेजी परंपराओं की नकल में हम अपने ही गौरवशाली इतिहास को भूलते जा रहे हैं। यही विस्मृति हमारी गुलामी का मूल कारण बनी।

आइए, इस शौर्य सप्ताह में उन सभी ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों को नमन करें, जिनकी वजह से आज हमारी सनातन संस्कृति, धर्म और राष्ट्र सुरक्षित हैं।

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह।

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