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गोबरधन योजना से गौसेवा, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया आधार

गोबर से ऊर्जा और जैविक खाद का उत्पादन, गौ संरक्षण से जुड़े आय के साधनों को मिलेगा बढ़ावा : जिलास्तरीय गौधाम समिति के रायगढ़ जिलाध्यक्ष बंशीधर बेहरा

रायगढ़। केंद्र सरकार की गोबरधन (GOBARdhan) योजना को गौसेवा, गौ संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताते हुए छत्तीसगढ़ राज्य शासन गौ सेवा आयोग द्वारा गठित जिला स्तरीय गौधाम समिति के जिला अध्यक्ष बंशीधर बेहरा ने कहा कि गोबर और कृषि अवशेष कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलकर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि GOBARdhan यानी Galvanising Organic Bio-Agro Resources Dhan का उद्देश्य गौवंश के गोबर तथा अन्य कृषि अवशेष कचरे का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG), बायोगैस और जैविक खाद तैयार करना है। इससे एक ओर गांवों में स्वच्छता एवं अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर गोबर गौपालकों और किसानों के लिए आय का बेहतर साधन बन सकता है।

बंशीधर बेहरा ने कहा कि गौवंश संरक्षण को केवल धार्मिक या भावनात्मक विषय के रूप में देखने के बजाय उससे जुड़े आर्थिक और रोजगार के अवसरों को भी समझने की जरूरत है। गोबर से जैविक खाद, बायोगैस और सीबीजी जैसे उत्पाद तैयार होने से गौशालाओं, गौपालकों, किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं।

उन्होंने कहा कि योजना के माध्यम से गौवंश के गोबर के साथ कृषि अवशेष, पराली, गन्ने की खोई और अन्य जैविक कचरे का उपयोग किया जा सकता है। इससे कचरे के बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि गोसेवा और गौ संरक्षण से जुड़े संगठनों को ऐसी योजनाओं का लाभ उठाकर गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यदि गोबर को व्यवस्थित रूप से एकत्र कर उसका वैज्ञानिक प्रसंस्करण किया जाए तो गौशालाएं केवल संरक्षण केंद्र न रहकर जैविक खाद, बायोगैस और अन्य उपयोगी उत्पादों के माध्यम से आय एवं रोजगार के केंद्र बन सकती हैं।

बंशीधर बेहरा ने आम जनता, किसानों, गौपालकों और ग्रामीण युवाओं से केंद्र सरकार की ऐसी योजनाओं की जानकारी लेकर उनका लाभ उठाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गोबर को कचरा नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा उपयोगी संसाधन मानकर उसका वैज्ञानिक उपयोग किया जाए तो स्वच्छता, पर्यावरण, रोजगार और गौ संरक्षण—चारों क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

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